DSSSB TGT CS Mock 01 – Q100

Question:

Passage:
दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और प्रश्न के उत्तर दें।
हिन्दी समीक्षकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के बाद जिस आलोचक का नाम बड़े आदर से लिया जाता है वह हैं आचार्य नंददुलारे वाजपेयी। उन्होंने छायावादी काव्य की विस्तृत समीक्षा करते हुए इस काव्यधारा को प्रतिष्ठित कराने में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनके द्वारा रचित कुछ महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ हैं- आधुनिक साहित्य, नया साहित्य – नए प्रश्न, कवि निराला, प्रकीर्णिका तथा राष्ट्रीय साहित्य। वे काव्य में सौंदर्य विधायक तत्वों के उद्घाटन पर विशेष बल देते हैं। कथा साहित्य और नाटक की आलोचना वह इनके प्रभावकारी पक्ष को ध्यान में रखकर करते हैं। प्रसाद जी के नाटकों को वे स्वच्छंदतावादी तथा लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटकों को पुनरुत्थानवादी कहना उपयुक्त मानते हैं। वे मूलतः छायावादी एवं स्वच्छंदतावादी समीक्षक के रूप में हिन्दी समीक्षा में प्रतिष्ठित हुए हैं। दूसरी ओर हजारी प्रसाद द्विवेदी शुक्ल परंपरा के समीक्षक हैं, किंतु शुक्लजी की कई मान्यताओं से सहमत नहीं हैं। वे कबीर को एक उच्च कोटि का कवि और समाज सुधारक मानते हैं। कबीर की भाषा की शक्ति पर विचार करते हुए वे उन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहते हैं। हिन्दी साहित्य की भूमिका, नाथ संप्रदाय, हिन्दी साहित्य, सूर साहित्य, कबीर आदि कृतियाँ उनके गंभीर चिंतन, मौलिक विवेचन को उजागर करती हैं। उनका दृष्टिकोण मानवतावादी अधिक है। मध्यकालीन धर्म साधना और तद्युगीन साहित्य का विश्लेषण करने में उन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई है।

Question: उपर्युक्त गद्यांश के लिए उचित शीर्षक का चयन करें।

Passage:
दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और प्रश्न के उत्तर दें।
हिन्दी समीक्षकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के बाद जिस आलोचक का नाम बड़े आदर से लिया जाता है वह हैं आचार्य नंददुलारे वाजपेयी। उन्होंने छायावादी काव्य की विस्तृत समीक्षा करते हुए इस काव्यधारा को प्रतिष्ठित कराने में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनके द्वारा रचित कुछ महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ हैं- आधुनिक साहित्य, नया साहित्य – नए प्रश्न, कवि निराला, प्रकीर्णिका तथा राष्ट्रीय साहित्य। वे काव्य में सौंदर्य विधायक तत्वों के उद्घाटन पर विशेष बल देते हैं। कथा साहित्य और नाटक की आलोचना वह इनके प्रभावकारी पक्ष को ध्यान में रखकर करते हैं। प्रसाद जी के नाटकों को वे स्वच्छंदतावादी तथा लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटकों को पुनरुत्थानवादी कहना उपयुक्त मानते हैं। वे मूलतः छायावादी एवं स्वच्छंदतावादी समीक्षक के रूप में हिन्दी समीक्षा में प्रतिष्ठित हुए हैं। दूसरी ओर हजारी प्रसाद द्विवेदी शुक्ल परंपरा के समीक्षक हैं, किंतु शुक्लजी की कई मान्यताओं से सहमत नहीं हैं। वे कबीर को एक उच्च कोटि का कवि और समाज सुधारक मानते हैं। कबीर की भाषा की शक्ति पर विचार करते हुए वे उन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहते हैं। हिन्दी साहित्य की भूमिका, नाथ संप्रदाय, हिन्दी साहित्य, सूर साहित्य, कबीर आदि कृतियाँ उनके गंभीर चिंतन, मौलिक विवेचन को उजागर करती हैं। उनका दृष्टिकोण मानवतावादी अधिक है। मध्यकालीन धर्म साधना और तद्युगीन साहित्य का विश्लेषण करने में उन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई है।

Question: उपर्युक्त गद्यांश के लिए उचित शीर्षक का चयन करें।

Options:

  • नन्ददुलारे वाजपेयी की समीक्षा पद्धति
  • छायावादी आलोचक
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी की समीक्षा पद्धति
  • शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना
  • नन्ददुलारे वाजपेयी की समीक्षा पद्धति
  • छायावादी आलोचक
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी की समीक्षा पद्धति
  • शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना

Correct Answer: d)

Explanation:

The correct answer is Option (4): शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना. The passage provides a comprehensive discussion of Hindi literary criticism after Acharya Ramchandra Shukla, highlighting the approaches and contributions of major critics of that era like Acharya Nand Dulare Bajpai and Acharya Hazari Prasad Dwivedi. Hence, the most suitable and comprehensive title is ‘शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना’ (Post-Shukla Hindi Criticism).

सही उत्तर विकल्प (4) ‘शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना’ है। प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के परवर्ती काल के दो मूर्धन्य आलोचकों—आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी—की समीक्षा पद्धतियों, दृष्टिकोणों और कृतियों का समग्र विवेचन प्रस्तुत किया गया है। अतः इसका सर्वथा उपयुक्त शीर्षक ‘शुक्ल परवर्ती हिन्दी आलोचना’ है।

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